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Go Back Xossip > Mirchi> Stories> Hindi > अधूरा प्यार -A romantic horror story

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update-10

जी अच्च्छा साहब...." भगवान दास ने अदब से सिर झुकाया और वहाँ से चला गया...


नितिन जैसे ही कमरे में घुसा.. उसने श्रुति को तेज़ी से अपनी आँखें बंद करते देख लिया..,"अच्च्छा.. तो अब मेरे चेहरे से इतनी नफ़रत हो गयी है कि देखना भी नही चाहती..." कहता हुआ नितिन बिस्तेर के पास जाकर खड़ा हो गया..


सिर से लेकर पाँव तक डर के मारे श्रुति काँपने लगी.. उसकी आँखें बंद थी..


नितिन का हर शब्द उसको अपने सीने में चुभता हुआ महसूस हो रहा था.. वह चुपचाप लेती रही..


"मैं सिर्फ़ तीन तक गिनूंगा...." नितिन ने अपनी बात पूरी भी नही कि थी कि श्रुति अचानक आँखें खोल कर उठ बैठी और नितिन से सबसे दूर वाले कोने पर जाकर उसको बेबसी से देखने लगी...


"बड़ी समझदार हो जाने-मॅन... अब क्या इरादा है?" नितिन ने बचकाने अंदाज में उसको और डराने की कोशिश की...


श्रुति कुच्छ नही बोली.. चुपचाप किसी मासूम मेम्ने की तरह उसको आँखें फाड़कर देखती रही जैसे खुद पर रहम करने की भीख माँग रही हो.. हालाँकि चेहरे के उड़े हुए रंग से सॉफ था की उसको रहम की उम्मीद थी नही...


"जिंदा रहना चाहती हो?" नितिन ने उसी रूखे स्वर में पूचछा...


श्रुति ने तुरंत अपना चेहरा हिलाया.. अब तो बस जिंदगी बचने की ही आस थी.. इज़्ज़त के साथ तो वो कब का समझौता कर चुकी थी...


"शाबाश.. लेकिन उसके लिए बहुत ज़रूरी है की मैं जो कुच्छ भी कहूँ.. जो कुच्छ भी पूच्छू.. आगया का तुरंत पालन होना चाहिए.. यदि एक बात भी तुमने नही मानी.. या एक बार भी झूठ बोला.. तो समझ लेना.. कमरे में पड़ी लाशों की तरह तुम्हे भी दूसरा मौका नही मिलेगा..."


"जी.." बड़ी मुश्किल से घुटि हुई आवाज़ श्रुति के गले से निकली...


"जाओ.. जाकर नहा लो.. तब तक मैं तुम्हारे लिए कपड़े निकालता हूँ.." नितिन ने शरारती आँखों से उसको उपर से नीचे घूरा..


"ज्जई.. यही ठीक हैं.." श्रुति ने हकलाते हुए कहा...


"क्या कहा था मैने? इतनी जल्दी भूल गयी..." नितिन ने उसको याद दिलाया की उसको उसकी हर बात मान'नि ही पड़ेगी...


"जी.. जी.. जाती हूँ.." कंपकँपति आवाज़ में बोलते हुए श्रुति ने तुरंत बाथरूम का रुख़ कर लिया... बाथरूम में घुसते हुए उसने मुड़कर नितिन की आँखों में देखा.. उसको विस्वास नही हो रहा था की अत्यंत सभ्य दिखने वाले उस इंसान की चमड़ी के पिछे एक घिनौना जंगली जानवर छिपा हुआ है....


अंदर जाकर उसने दरवाजा बंद कर लिया...


करीब 15 मिनिट बाद बाथरूम के दरवाजे पर खटखट हुई.. श्रुति सहम गयी.. वह अभी नहा ही रही थी..,"ज्जई.."


"नहाई नही हो क्या अब तक..?" बाहर से नितिन की आवाज़ उसके कानो में पड़ी....


"जी.. नहा ली.." पानी का नाल बंद करते हुए श्रुति ने मरी सी आवाज़ में कहा...

दरवाजा खोलो..!" नितिन के स्वर में सहज आदेश था जिसे श्रुति तुरंत समझ गयी.. उसकी आँखों से आँसू लुढ़क कर उसके नंगे बदन पर मोतियों की तरह दमक रही पानी की बूँदों में समाहित हो गये.. अब हो ही क्या सकता था.. उसने दरवाजे के पास आकर एक बार अपने मजबूर बेपर्दा हुश्न को मायूसी से देखा और चिताकनी खोल कर नितिन के अंदर आने का इंतज़ार करने लगी...


"अपने कपड़े मुझे दो..." नितिन ने बाहर खड़े खड़े ही रूखे स्वर में कहा..


"जी.. एक मिनिट.." श्रुति ने काँपते हाथों से अपनी कमीज़ और सलवार हाथ बाहर निकाल कर उसको पकड़ा दी...


"और?" नितिन अभी कपड़ों की गिनती से संतुष्ट नही था...


"जी.. क्या?" श्रुति उसका मतलब समझ नही पाई....


"नाम लेने पड़ेंगे क्या?" बाकी कपड़े भी दो..." नितिन ने अपनी मंशा को विस्तार से प्रकट किया....


श्रुति की रूह तक काँप गयी.. कुँवारी जवान लड़कियाँ अपनी ब्रा और पॅंटी को तो अपनी बेशक़ीमती अमानत की तरह छुपा कर रखती हैं.. पर जान बचने की हल्की सी उम्मीद लिए श्रुति उसकी हर बात मान'ने को मजबूर थी..."जी.."


श्रुति ने कहा और सुबक्ते हुए अपने वो आख़िरी वस्त्र भी हाथ बढ़कर बाथरूम से बाहर निकल दिए... उसको विस्वास हो चुका था कि आज वो किसी हालत में कुँवारी नही रहने वाली है...


"बाहर आ जाओ.." नितिन पॅंटी को नाक से लगाकर उसमें से आ रही खट्टी मीठी गंध का आनंद लेते हुए बोला...


"जी.. तौलिया..?" कुच्छ देर उसके नायाब हुश्न को शर्मसार होने से बचाने के लिए अब टवल ही एकमत्रा सहारा हो सकता था...


"बाहर आकर ले लो..." नितिन ने उसको तड़पने में कोई कसर नही छ्चोड़ी थी...


अब कहने को श्रुति के पास कुच्छ बचा ही नही था.. और ना ही कुच्छ छिपाने को.. बिलखती हुई वो घुटनो के बल वही बैठ गयी और अपनी सिसकियों को नितिन की नाराज़गी से बचने के लिए छिपाने की कोशिश करने लगी..


"मेरे पास ज़्यादा टाइम नही है..?" बाहर उसका इंतजार कर रहे नितिन ने ज़रा ऊँची आवाज़ में कहा....


बेबस श्रुति ने हल्का सा दरवाजा खोला और उसकी आड़ लेकर अपना चेहरा बाहर निकाला.. नितिन उस'से दूसरी तरफ मुँह किए खड़ा था.. उसके कंधे पर तौलिया टंगा हुआ था और एक हाथ में श्रुति की ब्रा और पॅंटी और दूसरे हाथ में कोई हल्की नीली ड्रेस थी..


"बाहर आकर टवल ले लो.." नितिन का स्वर हल्का सा नरम पड़ा...






बाहर निकलने से पहले श्रुति ने आखरी बार अपने कुंवारे बदन को मायूसी से देखा.. उसका अंग अंग इतना प्यारा था कि नितिन की कुत्सित नज़रों से ही मैला हो जाना था.. श्रुति अंदर से टूट चुकी थी.. अपनी जांघों को चिपकाए हुए, जो कुच्छ छुपा सकती थी.. उसको च्छुपाकर; नज़रें झुकाए हुए उसके कदम अपने आप ही बाहर नितिन की और बढ़ गये.. अब वो नितिन के इतना करीब आ चुकी थी कि नितिन उसकी सिसकियाँ महसूस कर सकता था... श्रुति ने अचानक तौलिए पर झपट्टा सा मारा और जितना बदन ढक सकती थी.. ढक लिया...


"अभी वो समय नही आया है.. चिंता मत करो.. आराम से अपना बदन पौंछ लो.." नितिन क़ी ये कुच्छ देर की दरियादिली श्रुति की समझ से बाहर थी.. मन ही मन डरी सहमी शरुति धीरे धीरे तौलिए से अपना बदन पौंच्छने लगी.. इस डर के साथ की ना जाने कब नितिन पलट जाए...


"पौंच्छ लिया...?" नितिन ने पूचछा...


"ज्जई.." मानो श्रुति को 'जी' के अलावा कुच्छ कहना आता ही ना था.. नितिन के बोलते ही उसने झट से तौलिए को अपनी सेब के आकर की छातियो पर लगाकर लटका लिया.. ताकि जितनी हो सकें.. जंघें भी ढक जायें...


"गुड..! ये लो.. पहन लो.." कहते हुए नितिन ने अपना हाथ पीछे करके नीली ड्रेस श्रुति की और बढ़ा दी...


ड्रेस लेते हुए श्रुति का हाथ नितिन के हाथ से टकरा गया और उसके पुर बदन में झंझनाहट सी दौड़ गयी.. कारण था उसका नन्गपन...


श्रुति ने एक हाथ को तौलिए के साथ ही अपनी चूचियो पर चिपकाए हुए दूसरे हाथ से ड्रेस को नीचे लटका कर देखा... निहायत ही खूबसूरत वन पीस स्कर्ट थी वो.. मखमली सी बारीक रेशे की बनी हुई.. एक दम मुलायम.. इस ड्रेस को श्रुति किसी और मौके पर अपने लिए देखती तो शायद उसके चेहरे पर अलग ही नूर होता.. पर अब वैसा नही था.. उसको लगा जैसे ये सब उसकी इज़्ज़त की बलि लेने से पहले की तैयारियाँ हैं... उसने ड्रेस को सीने से उपर लगाकर देखा.. ड्रेस उसके घुटनो तक आ रही थी...


"जी.. वो.." श्रुति को लगा बिना बोले कुच्छ नही होगा...


"वो क्या.." नितिन दूसरी और मुँह किए इस कल्पना में लीन था कि बेपनाह हुषन की मालकिन उस शानदार ड्रेस में कैसी दिखेगी...

मेरे कपड़े..!" अंजान मर्द से अपनी ब्रा और पॅंटी माँगते हुए श्रुति का चेहरा भय में भी लज्जा से लाल हो गया...


"हां.. पहन लो.. दे तो दी.." नितिन जानता था कि वो क्या माँग रही है.. पर जानते बूझते भी उसने यही जवाब दिया...


"नही.. वो.. अंदर वाले.." श्रुति की जांघों के बीच अजीब सी हुलचल हुई...


"जो तुम्हारे पास है.. वही पहन लो.." नितिन ने शरारत से कहा..


नितिन का लहज़ा नरम होता जान श्रुति ने थोड़ी सी हिमाकत कर ही दी.. और कहते हुए पूरी तरह पिघल सी गयी," सिर्फ़.. वो... पॅंटी दे दो!"


" मैने बोल दिया ना...."


नितिन ने पूरी बात बोली भी नही थी की कठपुतली की माफिक एक दम से श्रुति ने वो ड्रेस अपने गले में डाल ली..," जी.. पहनती हूँ.."


"गुड! पहन ली.." नितिन ने अब तक भी मुड़कर नही देखा था...


"जी!" श्रुति बुदबुदाई... चेहरा झुकाते हुए उसने अपनी छातियो पर मानसिक उत्तेजना की वजह से उभर कर दिख रहे 'दानो' को देखा.. और वह अंदर तक पानी पानी हो गयी.. बिना ब्रा के वो ड्रेस निहायत ही कामुक लग रही थी.. चूचियो और उसकी पेट से चिपकी हुई सी उस ड्रेस ने उसके बदन को सिर्फ़ ढक रखा था.. पर छुपा हुआ मानो कुच्छ भी नही था....


जैसे ही श्रुति ने नितिन को पिछे मुड़ते देखा.. वो उसकी तरफ पीठ करके खड़ी हो गयी.. नितिन भौचक्का सा श्रुति को देखता रह गया.. ड्रेस में वो उसकी कल्पना से कहीं अधिक कामुक लग रही थी.. नितंबों से चिपका हुआ कपड़ा उनकी दोनो फांकों का एक दम सही सही आकार बता रहा था... उनके बीच की खाई की सौम्यता भी मानो बेपर्दा सी थी.. जाने क्यूँ नितिन अपने उपर काबू किया हुए था.. श्रुति का शर्मीला स्वाभाव नितिन की उत्तेजना को और बढ़ा रहा था.. काप्ते हुए पैरों की खनक कंपन के रूप में नितंबों तक जाकर उसके गदराए हुषन को यौवन प्रकस्था तक ले गयी थी... जैसे उसकी जवानी थिरक उठी हो...


"इधर आकर बैठो.. " नितिन एक कुर्सी के सामने जाकर बेड पर बैठ गया.. सकुचती हुई श्रुति अपने दोनो हाथों को कंधे से लगाकर अपने यौवन फलों को च्छुपाने का प्रयास करती हुई मूडी और नितिन का इशारा समझ कुर्सी पर जाकर बैठ गयी....


"क्या लगता है तुम्हे? तुम वापस जा पाओगी या नही...?" नितिन ने श्रुति से काम की बात शुरू कर दी...


श्रुति कुच्छ नही बोली.. पहले से झुके हुए अपने चेहरे को थोडा सा और झुकाया और आँसू लुढ़का दिए....


मेरा ये रोज का काम है.. मुझे तुम्हारे आँसू प्रभावित नही कर सकते.. मैने तुम्हे बताया था कि तुम कैसे वापस जा सकती हो..? अब बताओ, क्या इरादा है?" नितिन ने अपनी आवाज़ में यथासंभव क्रूरता लाने की कोशिश करते हुए कहा..


"जी.. मैं... आपकी हर बात मानूँगी..." श्रुति को डराने के लिए किसी और नाटक की ज़रूरत ही ना थी.. अब तक जो कुच्छ हो चुका था.. वह काफ़ी से भी बहुत ज़्यादा था.. उसको अंदर तक हिलाने के लिए...


"शाबाश.. तो शुरू करें..?" नितिन ने उसी अंदाज में कहा...


"जी.." श्रुति के पास और कोई ऑप्षन था ही नही.. सिवाय उसकी हर बात मान'ने के...


"तुम्हे पता है कि तुम कितनी सुन्दर हो?" नितिन ने इस सवाल से शुरुआत की...


क्या कहती श्रुति? पर कुच्छ तो कहना ही था," जी.." कहते हुए उसके दीन हीन चेहरे पर नारी सुलभ गर्व प्रीलक्षित होने लगा...


"कैसे पता?" नितिन ने इस बार निहायत ही बेतुका सवाल किया...


"जी.. !" श्रुति को कोई जवाब नही आया...


"तुम्हारे अंदर ऐसा क्या है कि तुम्हे लगता है तुम औरों से सुन्दर हो..?" नितिन बात को पता नही कहाँ ले जाना चाहता था..


"जी.. कुच्छ नही.. और भी बहुत सुंदर हैं..." श्रुति को यही कहना मुनासिब लगा..


"नही.. मैने दुनिया देखी है.. बहुतों को अपने बिस्तेर पर लाकर देखा परखा है.. पर सच कहता हूँ.. तुम जैसी मैने आज तक नही देखी.. मैं जानता हूँ.. पर बताना तुमको ही है कि तुम्हारे अंदर दूसरों से अलग क्या है?" नितिन ने कहा..


"जी.. पता नही.." श्रुति ने धीरे से कहा..


"मैं बताउ?.. तुम्हारे एक एक अंग को छ्छूकर..?" नितिन ने धमकी दी..


श्रुति अंदर तक सिहर गयी.. सवालों के जवाब देना उसको अपनी इज़्ज़त देने से भी अटपटा लग रहा था.. और वो भी उस हालत में जबकि इज़्ज़त तो जानी ही जानी थी... वो कुच्छ नही बोली...


"खड़ी होकर यहाँ आओ..!"

श्रुति ने अक्षरश: आग्या का पालन किया... खड़ी होते ही उसके हाथ फिर से उसकी छातियों को ढकते हुए कंधों पर टिक गये... नज़रें झुकाए वह नितिन के पास आकर खड़ी हो गयी...


"ये क्या छुपा रही हो?" नितिन ने उसकी आँखों में आँखें डाल कहा...


"ज्जई.. क्या?" श्रुति उसकी बात को भाँप गयी थी..


"यही.. हाथों के नीचे.. हाथ सीधे क्यूँ नही करती.. मैं चाहता तो तुम्हे बिना कपड़ों के भी यहाँ खड़ा कर सकता था.. है ना?" नितिन ने कहा..


"जी.."श्रुति की आँखें दबदबा गयी.. उसने नितिन के दोबारा बोलने से पहले ही हाथ नीचे लटका दिए...


नितिन ने अपने हाथ आगे करके उसकी 28" कमर पर दोनो और टीका दिए.. श्रुति का पेट काँपने सा लगा... भय और उत्तेजजना की लहर तेज़ी से उसके पूरे बदन को कंपकँपति चली गयी..


ना चाहते हुए भी नितिन के मुँह से निकल गया," क्या चीज़ हो तुम..!"


श्रुति की आँखें पहले ही बंद हो चुकी थी...


"अच्च्छा चलो छ्चोड़ो.. आओ.. मेरी गोद में बैठ जाओ.. !" नितिन को अपने आवेगो पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था..


श्रुति ने चौंक कर नितिन की आँखों में देखा.. कितनी आसानी से उसने ये बात कह दी.... पर नितिन की आँखों में आदेशात्मक इशारे से वह टूट गयी.. कुच्छ प्रतिक्रिया देने की उसमें हिम्मत ही ना हुई... उसने तुरंत नज़रें वापस झुकाई और मुँह फेर कर खड़ी हो गयी.. उसको यकीन था कि नितिन उसको अपने आप ही खींच लेगा... सोचकर ही उसके नितंबों में खून का संचार हो गया.. नितंबों की थिरकन उसकी स्कर्ट के बारीक रेशों के उपर से ज्यों की त्यों महसूस की जा सकती थी...


"बैठो!" नितिन ने पयज़ामा पहन रखा था.. उसने अपनी जांघों को हल्का सा खोल दिया...


इस बार देर करने की हिम्मत श्रुति की नही हुई.. वह झुकती चली गयी और हल्की सी टीस अपने मुँह से निकलती हुई उसकी जांघों के बीच बैठ गयी," आआअहह!"


"क्या हुआ?" नितिन ने अंजान सा बनते हुए पूचछा...


अब श्रुति बताती भी तो क्या बताती.. नितिन एक साथ उसको दोनो तरह की चोट दे रहा था.. एक तरफ जान लेने का डर लगातार उसको थर्रए हुए था... और दूसरी तरफ उसकी अचेत जवानी की आग में घी डालता हुआ उसको और भड़का कर उसके जज्बातों को जिंदा करने की कोशिश की जा रही थी.. श्रुति को कपड़े के उपर से ही अपने नितंबों के नीचे कुच्छ 'साँस' सा लेता हुआ महसूस हुआ.. तेज़ी से फैल रही इस आग को पूरे शरीर में फैलाकर उसका असर कम करने की कोशिश में श्रुति ने अपनी कमर नितिन की छाती से चिपका दी....


नितिन ने अपने हाथ आगे करके उसकी जांघों पर रख दिए.. श्रुति की पलकें बंद होनी शुरू हो गयी...


"तुम्हे तो कोई भी पसंद कर सकता है.. है ना?" नितिन ने अपनी उंगलियों को उसकी मांसल जांघों पर नचाते हुए पूचछा...


इस हालत में श्रुति के लिए ऐसे सवालों का जवाब देना अपेक्षाकृत आसान था.. पर 'हां' कहते हुए भी उसके गले से 'हां' की बजाय 'अया' ही निकला..

नितिन का एक हाथ अब श्रुति के कमसिन पेट पर आग लगा रहा था...," रोहन को पटा सकती हो...?"


श्रुति के लिए अब उसकी जांघों के बीच लगातार ठोस होते जा रहे मर्दाना औजार की चुभन असहनीय होती जा रही थी... पर जवाब देना भी ज़रूरी था....," ज्जई.. पर्र..क्यूँ?"


"दौलत के लिए.. वो 80 करोड़ का अकेला मलिक है.. पर एक्दुम भोला है.. और तुम्हारे लिए पागल भी... सिर्फ़ तुम्हे उसको ये यकीन दिलाना है कि तुम ही उसकी नीरू हो...."


श्रुति को उसकी आधी बात ही समझ में आई.. उसकी जांघों के बीच बढ़ रही हुलचल के कारण उसकी उत्तेजना लगातार अनियंत्रित होती जा रही थी,"पर.... मैं तो उनको जानती भी नही..." श्रुति ने अपनी जांघें थोड़ी सी और खोल दी..


नितिन का हाथ अब थोडा और उपर होकर श्रुति की गोल और मुलायम छातियो के निचले भाग से जा टकराया था..,"उसकी चिंता मत करो... मैं तुम्हे सब समझा दूँगा.. उस'से मिलवा भी दूँगा.. तुम्हे कुच्छ नही करना.. बस मेरे हाथों का 'मोहरा' बन'ना है.. उस'से शादी करके तलाक़ लेना है बस.. 10 करोड़ तुम्हारे.. और 30 मेरे.. बोलो..."


श्रुति को तो अब तक सुन'ना भी बंद हो गया था.. उसके कानो में अजीब सी सीटियाँ बजने लगी थी... मारे कामुकता के उसने अपनी छातियो पर जा चढ़े नितिन के हाथों को वहीं दबोच लिया.. और छातियों में आ चुकी सख्ती को दबा दबा कर मुलायम करने की चेष्टा करने लगी.. उसकी साँसे अब जोरों से चलने लगी थी... नितंब नितिन की जांघों के बीच आगे पीछे होकर उस अंजानी खुजली को मिटाने का प्रयास करने लगे थे...




"थोड़ी देर बातें मत करो प्लीज़... मुझे कुच्छ सुनाई नही दे रहा.." श्रुति अब पूरी रंग में रंग चुकी थी....


"क्या हुआ?" नितिन ने अंजान बनते हुए पूचछा...


"पता नही.. पर प्लीज़.. बाद में चाहे कुच्छ पूच्छ लेना.. अब सहन नही हो रहा.." श्रुति बदहवास हो चुकी थी..


"स्कर्ट निकाल दो.." नितिन ने कहते हुए उसके गालों को चूम लिया....


नितिन के इस आदेश को पूरा करने में श्रुति ने एक पल भी नही लगाया.. उसको तो पहले ही नितिन और उसकी जांघों के बीच कपड़े की वो बारीक सी दीवार अपनी सौतन लगने लगी थी.. इस आदेश को श्रुति ने उसकी जान बखसने की शर्त नही बुल्की निमंत्रण माना.. झटके के साथ वह उठी और जांघों से स्कर्ट को खिसका उसके नितंबों से उपर करके कमर तक चढ़ा लिया और तुरंत वापस बैठ गयी...


श्रुति के नितंब उसके गालों की तरह ही गोरे और एकद्ूम चिकने थे.. उनको देख नितिन भी पागला सा गया और अपनी सारी प्लॅनिंग भूल कर उस पर टूट पड़ा.. श्रुति को अपनी गोद से उठाकर बेड पर पटका और उसके नितंबों की करारी खाई में अपनी उंगली फिराने लगा.. आनंद के मारे श्रुति ने उनको और उपर उठा चौड़ा करके उस गहराई को थोड़ा कम कर दिया...


"आआआहह बापू.. मैं तो गयी..." करारी और सॉफ किए हुए हुल्के बालों वाली योनि के दाने पर जैसे ही नितिन की उंगली ने स्पर्श किया.. श्रुति के बदन में आनंद की एक मीठी सी लहर दौड़ गयी.. एक ही पल में नितिन का हाथ मीठी गंध के योनि रस से तरबतर हो गया... श्रुति बिस्तेर पर अर्धमूर्छछित अवस्था में लंबी लंबी साँसे ले रही थी...


पर नितिन अब उसको आराम देने के मूड में नही था... उसने अपना पयज़ामा उतार फैंका.. वह भी बिना अंडरवेर के ही सोच समझ कर आया था... पयज़ामा उतारते ही फन उठाकर खड़े हो गये उसके हथियार को उसने श्रुति के हाथ में दे दिया.. श्रुति उल्टी लेटी होने के कारण उसको ढंग से देख नही पा रही थी... पर हाथ में गरमागरम तने हुए नितिन के लिंग के आते ही वह पलट गयी," हाए राम.. इतना बड़ा..!" आस्चर्य से उसने कहा..


नितिन बिना कुच्छ बोले सिर्फ़ मुस्कुराया और बाकी बचा हुआ श्रुति का शरीर भी स्कर्ट से बेदखल कर दिया... स्कर्ट से बाहर आते ही श्रुति की गोरी मस्त चूचियाँ कबूतरों की तरह फड़फड़ने लगी.. सख़्त हो जाने के बावजूद प्यारी सी कोमलता समेटे हुए दोनो चूचियों को अपने हाथों से मसलकर उनका आनंद लेता हुआ नितिन श्रुति की छाती पर आ चढ़ा.. उसका लिंग अब श्रुति की चूचियों के बीच फुफ्कार रहा था.. थोड़ा आगे झुक कर नितिन ने उसको श्रुति के होंटो से छुआ दिया.. पर श्रुति समझ नही पाई कि क्या करना है..?"


"मुँह खोलो..." पगलाए हुआ सा नितिन अब भी आदेशात्मक आवाज़ का इस्तेमाल कर रहा था..


श्रुति अब उसका इशारा समझ गयी.. अपना मुँह पूरा खोल कर उसने होंटो को गोल करके जितना हो सका उसने उनका दायरा बढ़ा दिया... नितिन ने झुक कर उसके मुँह में अपना सूपड़ा थूस दिया...," चूसो इसे... और अंदर लेने की कोशिश करो.. गले तक.."
श्रुति को ये सब अजीब सा लगा.. पर बेहूदा बिल्कुल नही.. अपनी तरफ से वो पूरी कोशिश करने लगी.. जितना अंदर ले सकती थी लिया और फिर अपना मुँह हिलाकर उसको अंदर बाहर करने लगी.. नितिन आनंद के मारे मरा जा रहा था.. सच है कि इस खेल में अनुभव का अलग ही मज़ा है.. पर ये भी सच है कि पार्ट्नर अगर बिल्कुल अनाड़ी हो तो उत्तेजना अपने चरम पर रहती है...


अचानक नितिन को लगा कि वह अब कुच्छ पल का ही मेहमान है तो उसने श्रुति के हाथों को दबोचा और पूरी ताक़त से अपना लिंग उसके गले में उतार दिया...
श्रुति छॅट्पाटा उठी.. उसको अपना दम घुट'ता सा महसूस होने लगा और उसने उसको निकालने की भरसक कोशिश की.. पर जब तक वो सफल होती.. नितिन के लिंग से निकले रस की धार उसके गले को तर करती चली गयी.. और उसके बाद अपने आप ही लिंग ने छ्होटा होकर उसको साँस लेने लायक जगह गले में दे दी...


नितिन मुस्कुराता हुआ उसके उपर से उठ गया.. श्रुति कुच्छ समझ नही पाई.. जिस पल नितिन ने उसके गले में लिंग फँसाया.. उसको तो यही अहसास हुआ था कि ये कोई मारने का तरीका है.. नितिन के अपने उपर से हट जाने के बाद वो उसको आँखें फाड़ कर देखने लगी...


"क्या हुआ..? नितिन ने उसको अपनी बाहों में उठा अपनी गोद में लिटा सा लिया.. इस स्थिति में श्रुति के नितंब एक बार फिर नितिन की जांघों के बीच थे.. पर इस बार नज़ारा दूसरा था.. गोद में सीधी लेटी हुई श्रुति की जांघों में छिपि बैठी कुँवारी तितली लाल होकर नितिन के मुँह में लार का कारण बन रही थी..
श्रुति को जब तक समझ में आता.. नितिन उसको बिस्तेर पर लिटा 69 की पोज़िशन में उसके उपर आ चुका था.. जैसे ही नितिन ने श्रुति की योनि को अपने होंटो से च्छुआ, उसकी सिसकी निकल गयी..,"अया.. ये क्या है?" कसमसाते हुए श्रुति ने कहा...
"बस देखती जाओ.. तुम्हारा दिल करे वो तुम करो.. मेरा दिल जो कर रहा है.. वो मैं करूँगा.." कहते ही नितिन ने वापस उसकी योनि से अपने होन्ट सताए और उसकी पतली फांकों के बीच रास्ते को अपनी जीभ से कुरेदने लगा..

खेल करीब 5 मिनिट तक चला... दोनो पागल से होकर एक दूसरे के अंगों को काट खाने को उतावले से होने लगे.. जैसे ही श्रुति की सिकियाँ बढ़ने लगी.. नितिन ने तैयार होकर अपने होंटो को पूरा खोलकर उसकी योनि को ढक लिया.. ताकि रस के एक भी कतरे से वह वंचित ना रह पाए... सखलन आरंभ होते ही श्रुति ने अपने नितंबों को उपर उठा लिया और हाँफने लगी.. बिस्तेर पर निढाल पड़ी हुई श्रुति पहले ही दिन दूसरी बार यौन आनंद के सागर में गोते लगाने लगी...

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Last edited by saadsidqwe : 3 Weeks Ago at 09:04 PM.

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for new story saad....

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update -11

साँसों की गति कम होने पर जैसे ही श्रुति ने आँखें खोली, नितिन को सामने बैठकर अपनी जांघों के बीच कुच्छ टटोलते पाया... वासना की खुमारी उतरने के बाद जब उसने नितिन को इस तरह अपनी कुँवारी योनि पर नज़रें गड़ाए देखा तो वह शरम से लाल हो गयी," क्या कर रहे हो?"


"अभी पता चल जाएगा..." नितिन ने इतना ही कहा और उसकी रस से तर योनि में अपनी उंगली घुसा दी.. हुल्के पर अजीब से दर्द ने श्रुति को उच्छलने पर मजबूर कर दिया..," ऊओई.. "


नितिन उसकी और देखकर मुस्कुराया और बोला," सच में लड़कियाँ इतनी कमसिन और नादान होती हैं.. आज पहली बार पता लगा...!"


ज़बरदस्ती वहाँ लाकर उसको डरा धमका हर बात के लिए मजबूर करने को नितिन के द्वारा 'प्यार' का नाम देने पर श्रुति की आँखें डॅब्डबॉ गयी..," प्यार ऐसे होता है क्या? जान से मारने की धमकी देकर.." श्रुति में जाने कहाँ से व्यंग्य करने का साहस आ गया...


"कौन मार रहा है तुमको जान से... तुम तो जान के करीब रखने वाली चीज़ हो जानेमन..." नितिन ने उंगली धीरे धीरे आगे पीछे करनी शुरू कर दी.. अब उंगली सररर से अंदर बाहर हो रही थी.. बिना रुकावट के..."


"अब तो मुझे बखस दोगे ना..? जाने दोगे ना यहाँ से...?" श्रुति बहकति हुई साँसों के साथ भावुक हो उठी...


"तुम्हे कुच्छ नही होगा जान.. मैं बाद में बात करूँगा... अब प्लीज़ चुप हो जाओ और प्यार करने का आनंद लो.. मेरा वादा है.. तुम जो चाहोगी वैसा ही होगा..." नितिन इतने कोरे माल को पाकर धन्य हो उठा था...


श्रुति ने अपनी आँखें बंद कर ली और एक बार फिर नितिन की उंगली के साथ अपने नितंबों की थिरकन से ताल मिलाने लगी.. नितिन का जोश भी अब हिलौरे मार रहा था.. उसने अपनी उंगली निकाली और श्रुति की टाँगें उपर उठाकर योनि के होंटो पर अपना लिंग सटा दिया...


इसके साथ ही श्रुति को फिर से बेचैनी सी महसूस होने लगी.. उंगली की बजाय इस गरम और मोटी चीज़ का स्पर्श ज़्यादा आनंदकरी था.. पर इतना मोटा?.. यही सोचकर उसकी धड़कने बढ़ने लगी थी," प्लीज़.. आराम से.. तो... आआआआअहह.. मर गयी.. निकाल लो... प्लीज़.." श्रुति का लहज़ा बोलते बोलते अचानक बदल गया.. आनंद अचानक तीव्र पीड़ा में बदल गया और अंदर गये औजार को बाहर निकालने की अनुनय करती हुई वा च्चटपटाने सी लगी...


"अब निकालने का कोई फायडा नही जान.. उल्टा दर्द ज़्यादा ही होगा..." कहते हुए अपने सूपदे को योनि मुख में डाले हुए ही उसने श्रुति को कसकर दबोचा और उसकी चूचियो पर झुक गया... गोल गोल छाती को एक हाथ से प्यार से मसलता हुआ नितिन जैसे ही उसकी दूसरी चूची से रास्पान सा करने लगा.. श्रुति का मन दावदोल हो गया.. आनंद और पीड़ा की एक साथ अनुभूति ने उसको अजीब से धर्मसंकट में डाल दिया... धीरे धीरे जब उसकी पीड़ा कम होनी शुरू हुई तो आनंद उस पर हावी हो गया और वो फिर से 'तीसरी' बार की तैयारी में मस्त होकर नितंब उपर उठाने लगी.. नितिन धीरे धीरे अंदर होता जा रहा था...


"आआआहह.." जैसे ही नितिन का लिंग पूरा श्रुति के अंदर समाया, श्रुति पागल सी हो गयी.. दर्द के मारे नही.. आनंद के मारे.. नितिन ने लगभग पूरा लिंग बाहर खींचा और इस बार ज़्यादा तेज़ी के साथ अंदर कर दिया.. तेज़ी बढ़ने से आनंद में भी वृधि हुई थी.. श्रुति ने नितिन की कमर पर हाथ ले जाकर उसको अपनी चूचियो पर चिपका लिया.. अब रास्ता एकद्ूम सॉफ था.. नितिन के धक्कों की गति तेज हो गयी और हर धक्के के साथ वो बढ़ती ही गयी.. साथ में साँसें भी... साथ में धड़कने भी.. श्रुति के मंन का सारा डर निकल कर अब वासना के इस अजीबोगरीब सफ़र में नितिन का हुमराही बन गया.. नितिन उपर से धक्का लगाता और एक उसी वक़्त श्रुति नीचे से... धक्कम धक्का की इस रेलाम पेल में उनको ये अहसास तक नही हुआ कि बिस्तेर की चदडार का एक छ्होटा सा हिस्सा खून के धब्बों से रंग चुका है... ये रेलाम पेल तब तक जारी रही, जब तक कि श्रुति ने तीसरी बार सखलित होकर अपनी जांघें भींचने की कोशिश शुरू नही कर दी... अब नितिन का ठहरना नामुमकिन था.. पर अंदर ही झड़ने की बजाय उसने श्रुति के योनि रस और खून से सना अपना लिंग निकाल कर उसके पेट पर धारदार पिचकारी छ्चोड़ दी.... और फिर उसके उपर लाटेकर ही अपनी साँस उतारने लगा....

श्रुति की आँखें नम हो गयी... नितिन ने देखा और पूचछा," क्या हुआ?"

अब तुम मुझे मारोगे तो नही ना....?" श्रुति ने उसकी आँखों में देखते हुए पूचछा....


"तुम तो बिल्कुल पागल हो... जाओ.. जाकर नहा लो.. फिर बात करते हैं..." कहते हुए नितिन ने उसको बाहों में उठाया और बाथरूम के दरवाजे पर उतार दिया...," मैं भी नाहकार आता हूँ.. तब तक..."


श्रुति उसको गौर से देखती हुई पल पल में आ रहे उसमें बदलाव के कारण को समझने की कोशिश करने लगी... अटनाक से ग्रस्त उसके दिल के एक छ्होटे से हिस्से में अब जीने की आस बढ़ गयी थी..


बाथरूम से नहा कर श्रुति ठहरे और थके हुए कदमों से बाहर निकली.. उत्तेजना का भूत दिमाग़ से उतरते ही उसको फिर से 'अपनी जान' और बापू की चिंता सताने लगी.. नितिन नहा धोकर बेड पर पसरा हुआ था.. श्रुति को देखते ही उसने बैठ कर अपनी बाहें फैला दी," आओ जाने मॅन!"


श्रुति किसी खिलौने की तरह उसके करीब आकर खड़ी हो गयी.. नितिन ने हाथ बढ़कर उसका हाथ पकड़ा और अपनी बाहों में खींच लिया.. श्रुति निढाल सी उसके उपर जा गिरी...


नितिन ने प्यार से उसके गालों को चूमा," तुम किसी बात की फिकर ना करो... वो सब सिर्फ़ एक नाटक था.. तुम्हे डराने के लिए.. ताकि तुम चुपचाप मेरी हर बात मान लो.."


नितिन के बात करने के लहजे में आए बदलाव से श्रुति कुच्छ हद तक निसचिंत हुई.. पर पूरी तसल्ली उसको नही हुई थी," पर.. वो लाशें?" याद करते हुए श्रुति का पूरा बदन झनझणा उठा...


"हा हा हा... एक मिनिट.. भगवान दास...!" नितिन ने ज़रा ज़ोर से आवाज़ लगाई...


"जी साहब.."भगवान दास दरवाजे के बाहर से बोला...


नितिन उठा और दरवाजा खोलते हुए बोला," ज़रा एक बार वो लाश उठाकर लाना..!"


भगवान को अहसास नही था कि नाटक ख़तम हो चुका है.. नितिन के करीब आते हुए धीरे से बोला..," पर साहब.. उनको तो मैने धो दिया है..."


"हां.. हां.. वही.." कहते हुए नितिन वापस बिस्तेर पर आकर श्रुति से दूरी बनाकर बैठ गया...," दरअसल वो रब्बर के पुतले हैं.. शिकार के दौरान उन्न पर खून लगा मैं उनको जानवरों को आकर्षित करने के लिए यूज़ करता हूँ.. अभी तुम पूरी रोशनी में उनको देखोगी तो सब समझ जाओगी..."


श्रुति प्रतिक्रिया देने ही वाली थी कि भगवान दास 'एक लाश' को बालों से पकड़ कर खींचता हुआ कमरे में ले आया...


श्रुति हैरत के मारे उच्छल पड़ी," ये तो... नकली हैं...!"


"मैं क्या अभी फ़ारसी में बोल रहा था...!" नितिन ने मुस्कुराते हुए कहा...," मैं क्या तुम्हे आदमख़ोर दिखाई देता हूँ...?"


श्रुति ने खुद को ठगा सा महसूस किया... ये पुतले ही थे जिन्होने श्रुति को अपनी मर्ज़ी से बिना किसी प्रतिरोध के अपना शरीर नितिन को सौंपने पर मजबूर कर दिया.. वरना..," अब तो मुझे घर छ्चोड़ आओ.. मैं कुच्छ भी कह दूँगी बापू को... सुबह तक नही गयी तो वो तो मर ही जाएँगे..."


"अभी कहाँ.. अभी तो तुम्हे लाने का असली मकसद पूरा करना है... बापू जी की चिंता मत करो.. मैने एक लड़की से घर फोने करवा दिया है कि तुम उसके पास हो..." नितिन ने श्रुति को धाँढस बँधाया...


"पर... तुम्हे घर का नंबर. कहाँ से मिला...?" श्रुति ने आस्चर्य से कहा...


" तुम्हारे बापू से लिया था.. जब मैं और वो अकेले बैठे थे... यूँही.." नितिन दरवाजा बंद करके उसके पास आकर बैठ गया...


श्रुति को अब अपने आप से ग्लानि हो रही थी.. जान बचने का भरोसा मिलने के बाद उसको अपने भंग हो चुके कौमार्या का गहरा पासचताप था... ये पीड़ा अब उसके दिल में टीस बनकर उभरने लगी...," पर आपने ऐसा क्यूँ किया.. मेरे साथ?" श्रुति ने भावुक होकर दर्द से भारी आँखों से नितिन की आँखों में देखा..


"तुम्हारे 10 करोड़ और अपने 30 करोड़ के लिए.. अगर तुम मुझसे शादी करना चाहो तो ये हमारे 40 करोड़ भी हो सकते हैं..." शादी का जिकर करके नितिन ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया.. उसको कतयि अहसास नही था कि उसको शादी के लिए प्रपोज़ करने वाला पहला शख्स इस अंदाज में उस'से रूबरू होगा.... सोचकर ही श्रुति पूरी तरह टूट गयी और सुबकने लगी...


"डॉन'ट बी एमोशनल यार.. जिंदगी में कुच्छ हासिल करने के लिए कुच्छ खोना ही पड़ता है... और 10 करोड़ के लिए ये कीमत कुच्छ भी नही.. तुम रोना धोना छ्चोड़ ध्यान से मेरी बात सुनो...!" नितिन ने उसकी और गौर से देखते हुए कहा...

क्या सुनू मैं अब?" श्रुति फट सी पड़ी..," आपको अहसास भी है कि एक लड़की के लिए उसकी इज़्ज़त क्या मायने रखती है.. ? आप मेरी कीमत लगा रहे हो.. मेरी जिंदगी की... अब अगर मैं जियूंगी तो सिर्फ़ बापू के लिए.. घुट घुट कर.. आपको नही पता की आपने मुझे क्या जखम दिया है..!" श्रुति सुबकने लगी...


"पर मैने कहा ना.. मैं तुमसे शादी तक करने को तैयार हूँ.. मेरी बात तो सुन लो..." नितिन एक पल के लिए श्रुति की नफ़रत उगलती आँखों को देख बॅकफुट पर आ गया...


" सीना तान कर कहते हो कि जाने कितनी ही लड़कियों को इस तरह बिस्तेर पर लेकर आए हो! किस किस से शादी करोगे.. बलात्कार करने के बाद... बोलो!" श्रुति चिल्ला पड़ी.. उसके आँसू अब भी नही थम रहे थे...


"हे.. एक मिनिट.. मैने तुम्हारे साथ कोई ज़बरदस्ती नही की.. मेरे पास सबूत भी है.. अब मेरी नरमी का ज़्यादा फयडा उठाने की कोशिश मत करो.. शादी के लिए मैने सिर्फ़ इसीलिए ऑफर किया है कि तुम मुझे पसंद हो.. इसीलिए नही कि मैं तुमसे प्यार करने का हर्जाना भुगतना चाहता हूँ.. समझी.. चुप चाप मेरी बात सुनो.. वरना भगवान दास को भी नयी नयी लड़कियों का बड़ा शौक है... और उसका अंदाज तुमसे सहन नही हो पाएगा..." नितिन खिज कर गुर्राने सा लगा...


श्रुति को तो डरने के लिए हूल्का सा इशारा ही काफ़ी था.. खुद को भगवान दास को सौंप दिए जाने की धमकी सुनकर तो वह थर्रा सी उठी... यहाँ वह उनका विरोध कर भी कैसे सकती थी.. अपने आपको सिसकने से रोकने की कोशिश करते हुए उसने आँसुओं को पौंच्छा और चुप होकर बैठ गयी....


"मेरा एक काम तुम्हे करना होगा.. बदले में तुम्हे मैं इसकी कीमत भी दूँगा.. 10 करोड़..." नितिन ने उसके हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहा....


"क्या? " श्रुति का जवाब 10 करोड़ के लालच की वजह से नही आया.. पर जवाब देना ज़रूरी था.. बात सुन'ना ज़रूरी था..


"पहले तुम्हे मैं एक कहानी सुना दूं... रोहन अपने बाप का इकलौता लड़का है.. जाहिर है उसके बाप की 80 करोड़ की वसीयत सीधी उसके ही हिस्से आनी है... पर मुझे नही लगता वो इस दौलत को संभाल पाएगा.. बड़ा सीधा और सरल है बेचारा... कोई ना कोई उस'से वो दौलत हथिया ही लगा.. तो क्यूँ ना मैं ही कुच्छ सोच लूँ.. हे हे हे.. वैसे मुझे बड़ा भाई मानता है बेचारा...!" कहते हुए नितिन रुक गया...


श्रुति के कोई प्रतिक्रिया ना देने पर उसने बोलना जारी किया..," दर असल कयि महिने से उसको अजीब से सपने आ रहे हैं... उसके सपनो में तुम आती हो और अपने पास बुलाती हो.. पूर्व जनम का वास्ता देकर.. ये सब अजीब है और मेरी समझ से बाहर भी.. पर कुच्छ घटनाओ ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.. रात को तुम्हारा जो कमीज़ फटा.. वो तुमने खुद उसके सपने में फाडा था.. कितना अजीब है ना.. खैर हमें उस'से क्या लेना देना.. सिर्फ़ काम की बात सुनो.. तुम्हे देखकर वो तुम्हे ही अपने सपनो की रानी मान'ने लगा था.. पर फिर सपने में तुमने ही उसको ये बोला कि वो लड़की मैं नही हूँ.. कोई और है.. नीरू नाम की.. समझी कुच्छ?"


"नही..!" सच में श्रुति के मॅन में कुच्छ भी पल्ले नही पड़ा...


"चलो एक मिनिट.. तुम्हे सारी बात विस्तार से बताता हूँ.." कहकर नितिन उसको पूरी कहानी बताने लगा जो उनके टीले पर जाने से शुरू हुई और आज दोपहर रोहन द्वारा सारी सपना-कहानी का पटाक्षेप करने पर ख़तम....


"अगर उसकी सारी कहानी उसके दिमाग़ का वेहम है तो फिर तुम्हे वो पीपल के पास दौरा क्यूँ पड़ा..?" श्रुति ने कहानी में पूरी दिलचस्पी ली.. हालाँकि वह उसको उसके दिमाग़ का वेहम नही बुल्की पूर्वजनम की कोई सच्ची अनकही कहानी मान रही थी...


"वो मैने नाटक किया था.. एक तरफ मैं उसको ये कह रहा था की ये सब कुच्छ नही है.. दूसरी तरफ उसके दिमाग़ में थूस थूस कर नीरू का भूत भर देना चाहता हूँ.. ताकि उसको मुझ पर रत्ती भर भी शक ना हो..." नितिन ने जैसे अपने मन की पूरी गंदगी निकाल कर उसके सामने रख दी...


श्रुति ने उसकी आँखों में देखा.. नितिन को अपने लिए श्रुति की आँखों में घृणा का संचार होते देखा," ऐसे क्या देख रही हो?"
"कुच्छ नही.. अब.. मुझसे क्या चाहते हो...?" श्रुति ने नज़रें झुकते हुए कहा...


"यही कि तुम इस प्लान में मेरा साथ दो... तुम रोहन को विस्वास दिलाओ की तुम्हे सब कुच्छ याद आ गया है.. और तुम्ही उसके पूर्वज़नम की प्रिया हो.. यानी इस जनम में रोहन की नीरू...!"
......................................................................................................
"समय की पाबंदी तो कोई तुमसे सीखे.. कितने बजे का टाइम दिया था तुझे?" रोहन रविंदर के आते ही उस पर गुर्राया...
ओये होये.. क्या बात हो गयी यारा...? टेन्षन ना ले.. आ तो गया ना मैं.. देख तेरी खातिर बिना नहाए ही भाग आया हूँ उठते ही... खाली ड्राइक्लेन की और पर्फ्यूम लगा लिया..," रविंदर ने अगली बात धीरे से उसके कान में कही," मैइले कपड़ों में ही.. धुले हुए मिले ही नही यार.. तूने कल रात को ही बताया..."


"तू नही सुधरेगा...! ट्रेन निकाल दी ना.. ट्रेन से चलने का प्रोग्राम था.. अब बस से जाना पड़ेगा.." रोहन ने मुँह बनाया...


" ऐसी भी क्या जल्दी है? आने वाली अपने आप सुधार देगी.. कोई इस जैसी सोहनी.." पास से गुजर रही सुंदर सी मस्त फिगर वाली लड़की को देखकर रविंदर ने जुमला फैंका... लड़की ने शायद बात सुन ली.. अपनी चाल को धीमी करके लड़की ने रविंदर को घूरा और आगे निकल गयी

देख कैसे देख रही थी.. मुझे ऐसी ही किसी की ज़रूरत है.. लाल मिर्ची जैसी.. जो मुझे सुधार सके.. है ना!.. हे हे हे" रविंदर ने थोड़ी और तेज आवाज़ में बात कहकर लड़की तक अपनी फरियाद पहुँचा ही दी....


"अपनी ज़ुबान को फेविकोल से चिपका कर रखा कर.. नही तो किसी दिन ऐसी धुलाई होगी कि.." रोहन ने वापस मुड़कर देख रही लड़की की तरफ देख कर आँखों ही आँखों में खेद प्रकट किया..


"ओये धुलाई उलाई छ्चोड़.. चल बस स्टॅंड ढूँढते हैं.. नही तो बस निकलने का ठीकरा भी मेरे ही सिर फोड़ेगा तू... बाकी लड़की पटाखा थी यार... नही?" रविंदर अब भी बाज नही आया...


"अबे ये क्या है चाचा... बस स्टॅंड ही तो है ये!" रोहन चिल्ला उठा...


"ओह माइ गॉड.. आइ'एम सो सॉरी.. मैं तो भूल ही गया था कि तूने मुझे दोबारा फोन करके बस-स्टॅंड पर आने को बोला था.. पर हम जा कहाँ रहे हैं.. ये तो बता दे..." रविंदर का बोलना बदस्तूर जारी था...


"जहन्नुम में.. अब तू चुप चाप खड़ा रह.. थोड़ी देर.. बस आने वाली है..."


"देख भाई.. जन्नत में चल या जहन्नुम में.. पर ख़टरा बस में में नही जाउन्गा.. नयी सी बस होनी चाहिए कोई... एक्सप्रेस!" रविंदर ने कहा...






"हुम्म.. तेरे बाप दादा ने एरपोर्ट बनवा रखा है यहाँ... खैर.. उसकी चिंता मत कर.. ए.सी. कोच है.."


"फिर ठीक है.. देख भाई.. जहाँ भी चलना है.. मुझसे बात मत करना.. रास्ते भर सोता जाउन्गा.. आज 5 घंटे पहले उतना पड़ गया.. तेरी वजह से... वैसे चलना कहाँ है यार.. बता ना..."


"तू चुप होगा तभी तो मैं बात करूँगा....यहाँ से अमृतसर चल रहे हैं.. आगे की आगे बताउन्गा.. अब और कुच्छ मत पूच्छना...!" रोहन ने उसको कहा...


"अमृतसर? अमृतसर में तो एक बार मेरी दादी खो गयी थी यार... स्वरण मंदिर के आगे कुलच्चे खाने के लिए गाड़ी से उतर गयी.. और मेरे दादा जी को याद ही नही रहा की उनके साथ दादी जी भी हैं.. बस.. फिर क्या था.. गाड़ी स्टार्ट करके चलते बने... बाद में ध्यान आया तो बड़े परेशान हुए.. पता है ढूँढते हुए वापस आए तो दादी क्या करती मिली...?" रविंदर तूफान मैल की तरह था....


"क्या यार?" रोहन ने खीजकर कहा...


"कुल्छे खाते मिली.. और क्या? कुल्छे खाने ही तो उतरी थी.. हे हे हे"


"बस अब चुप हो जा... बस आ गयी.. चल बॅग उठा...." रोहन ने उसका भोँपू बंद करवाया और बॅग उठाकर वो बस की तरफ चल पड़े....


"आहा.. अगर बस की सीट ऐसी हों तो फिर घर का पेट्रोल क्यूँ फूँकना....! सच में.. मस्त नींद आएगी यहाँ तो.." कहते हुए रविंदर ने अपने पैर उपर करके आगे वाली सीट पर रखकर सोने का प्रोग्राम सेट करना शुरू कर दिया..


आगे वाली सीट से एक सरदार जी ने पिछे मुँह निकल कर रविंदर को घूरा," ओये! पूरी बस को खरीद लिया है क्या तूने... पैर तो नीचे कर ले...!"


"अभी कहाँ सरदार जी.. अभी तो टेस्ट ड्राइव पर जा रहे हैं... हा हा हा.." कहते हुए रविंदर ने पैर नीचे रखे और अपनी बेल्ट ढीली करने लगा....

"क्या हुआ जी? क्यूँ सारा दिन सींग पीनाए घूमते रहते हो?.. सीधे नही बैठा जाता क्या?" सरदार्णि अपने सरदार पर ही सवार हो गयी...


"मैने क्या कहा है लाडो.. मेरे कंधे पर पैर रखेगा तो क्या मैं बोलूं भी नही..... देख.. तेरी गिफ्टेड शर्ट पर मिट्टी लगा दी... बस.. इसीलिए गुस्सा आ गया था..." सरदार जी ने खीँसे निपोर्ते हुए सरदारनी के आगे घुटने टेक दिए..


अचानक बस में चढ़ि एक लड़की को देख रोहन की साँसे वहीं की वहीं थम गयी.. खुले बालों को सुलझती हुई सी वो लड़की नज़रें नीची किए हुए अपनी सीट का नंबर. ढूँढती हुई आ रही थी... गोरे रंग और सम्मोहित कर देने वाले नयन नख्स ने रोहन को कुच्छ पलों के लिए बाँध सा दिया.. ग्रे कलर की धरीदार जीन और राउंड नेक की वाइट टी-शर्ट के उपर कॉलर वाली लाइट वाय्लेट कलर की बिना बटन की जॅकेट पहने उस लड़की की आँखों में ऐसा जादू था कि बस में बैठा हर सख्स उसको निहारने लगा...रोहन का क्षणिक सम्मोहन तभी टूटा जब वो उनके पास आकर खड़ी हुई..,"एक्सक्यूस मे! ये हमारी सीट है...!"


रविंदर रोहन को कहाँ बोलने देता," अच्च्छा.. सीट साथ लानी पड़ती हैं क्या घर से? मैने सोचा बस में ही मिल जाती होंगी.... कोई ना जी.. आप भी आ जाओ.. काफ़ी चौड़ी सीट है.. वो क्या है कि हम सीट लाना भूल गये.. क्यूँ रोहन?" कहकर रविंदर एक तरफ को खिसक लिया....


लड़की को उसकी बात पर हँसी भी आई और गुस्सा भी.. उसकी बेढंगी बात से सहम सी गयी लड़की को अचानक समझ नही आया की क्या बोले.. वो कुच्छ बोलती, इस'से पहले ही रोहन बोल पड़ा...," सॉरी मिस! ये कभी बस में बैठा नही है.. इसीलिए.. पर मेरे ख़याल से ये हमारी ही सीट है....!"


"अच्च्छा.. मेरे मज़ाक को मेरी नासमझी बता कर तू मेरा ही मज़ाक उड़ा रहा है साअ.." फिर लड़की की और देखकर मुँह से निकल गयी ग़ाली को वापस खींचते हुए बोला," वो क्या है की.. जैसे मर्द कभी अपनी ज़ुबान नही बदलते.. वैसे ही सीट भी नही बदलते.. पर जाओ.. हमारी सीट ढूँढ कर उस पर बैठ जाओ.. हम बड़े ही नरम दिल वाले हैं.. कुच्छ नही कहेंगे.. क्यूँ रोहन?" कहकर रविंदर लड़की की और आँखें फाड़ कर देखने लगा...


लड़की को अचानक जाने क्या सूझा.. उसने खिड़की से बाहर झाँका और आवाज़ लगाई..," रिट्युयूवूयूयुयूवयू.. जल्दी आआआआ!"


"क्या हुआ?" लड़की कुच्छ इस अंदाज में उपर चढ़ि जैसे आपात स्थिति में किसी ने उसको मदद के लिए पुकारा हो... लड़की वही थी जिस पर रवि ने बस-स्टॅंड पर खड़े होकर बातों ही बातों में जुमले कसे थे...," क्या हुआ? कोई प्राब्लम है क्या?"


ऋतु से अपने लिए इतनी हुम्दर्दि पाकर लड़की सुबकने लगी," ये हमारी सीट नही छ्चोड़ रहे..."


"तुम? " ऋतु रवि को पहचान कर गुस्से से आग बाबूला हो गयी...


"ओह्ह.. हम एक दूसरे को जानते हैं क्या? मेरी यादास्त थोड़ी कमजोर हैं.. पर देख लो.. तुम्हारा नाम अभी भी मुझे याद है.. ऋतु!.. वैसे.. कहाँ मिले हैं हम पहले..?" रवि ने सीना तानते हुए बत्तीसी निकाल दी..


"अभी बताती हूँ... चलो.. उठो यहाँ से.. नही तो अभी पोलीस अंकल को बुलाती हूँ..." ऋतु ने तैश में आकर बाँह चढ़ा कर कुल्हों पर हाथ जमा लिए...


"पोलीस मामा तुम्हारे अंकल हैं क्या? हमारी तो वैसे ही रिश्तेदारी निकल आई... हे हे हे.." रवि कहाँ काबू में आता....?

चल उठ ना यार.. पिछे वाली सीट होगी हमारी.. सॉरी.. मिस.. डॉन'ट माइंड प्लीज़.." कहते हुए रोहन ने खड़ा होकर रवि को खींच लिया... मजबूरन रवि को उठना पड़ा... और दोनो पिछे वाली सीट पर जाकर बैठ गये...


"एय्यय.." लड़की ने पिछे देख कर रवि को अपने नाज़ुक हाथों के डोले बना कर चिड़ाया," पता है ऋतु.. मर्द कभी अपनी सीट नही बदलते... हा हा हा हा..."


रवि कुच्छ बोलता, इस'से पहले ही रोहन ने उसके मुँह को अपने हाथ से दबा दिया," कुच्छ मत बोल यार.. लड़कियाँ हैं.. खम्खा पंगा हो जाएगा..."


बेचारों को बैठे पूरा 1 मिनिट भी नही बीता होगा की एक जोड़ा आकर उनके पास खड़ा हो गया," एक्सक्यूस मे.. ये हमारी सीट है..."
रवि से रहा ना गया... अमिताभ की आवाज़ की नकल करते हुए बोला," जाओ.. पहले वो सीट देख कर आओ जिस पर हमारा नंबर. लिखा है.. ये लो हमारी टिकेट... हयें.."


मरियल से उस आधे गंजे हो चुके लड़के ने चुपचाप टिकेट्स पकड़ ली.. और नंबर. देखते ही बोला..," सर यही तो हैं आपकी सीट.. आगे वाली..."


"क्या? क्या कहा? फिर से बोलना मेरे यार.. प्लीज़..." रवि उच्छल कर सीट से खड़ा हो गया..


"हां सर.. यही तो हैं.. 13-14 नंबर.. ये लड़कियाँ ग़लती से बैठ गयी लगती हैं.." लड़के ने दोहराया..


"ओये होये.. लाले दी जान.. जी करता है तेरा सिर चूम लूँ.." रवि ने एक पल भी नही लगाया आगे वाली सीट तक पहुँचने में," आ.. उठती है या पोलीस मामा को बुलाउ? हा हा हा हा हा.. मर्द कभी अपनी सीट नही छ्चोड़ते..."


अब लड़कियों को भी थोड़ा शक हुआ.. ऋतु ने कहा," ढंग से देख एक बार.. हमारी सीट का नंबर.."


लड़की ने अपनी जेब से टिकेट्स निकाली और बोली," यही तो हैं.. 8-9 नंबर."


"चल उठ यहाँ से.. 8-9 नंबर. अगली सीट्स का है... सीट नंबर. सीट के पिछे लिखा होता है पागल..." और दोनो लड़कियाँ झेन्प्ते हुए सीट छ्चोड़ने लगी...


"वा वा वा वा.. आजकल लड़कियाँ भी डोले शोले दिखाने लगी हैं.. क्या बात है.. वा वा!" रवि से इस मौके का फायडा उठाए बिना रहा ना गया...


"चुप कर यार.. बहुत हो गया.. ग़लती किसी से भी हो सकती है..." रोहन ने उसको शांत रहने की सलाह दी....


बेचारी दोनो लड़कियाँ सरदार जी के पास पहुँच गयी," एक्सक्यूस मे अंकल.. ये सीट हमारी है..."


"ओये कमाल कर रही हो कूडियो.. अभी इन्न बच्चों के पिछे पड़ी थी.. अब हमें परेशान करने आ गयी.. सारी सीट तुम्हारी हैं क्या? ये देखो हमारे नंबर. 8-9. सीधे भटिंडा तक की हैं..." सरदार ने सीना ठोंक कर कहा...


रवि जो उनकी बातें बड़े गौर से सुन रहा था, तपाक से बोला," पर ताउ.. बस तो अमृतसर जा रही है...."


"हैं? क्या?" सरदारजी ने चौंकते हुए पूचछा...


"और क्या? " कहकर लड़कियाँ भी हँसने लगी....


"ओह तेरी.. हमारी तो बस ही निकल गयी.. मैं भी कहूँ आज बस इतनी लेट कैसे है...?" सरदारजी सकपकाकर खड़े हुए और अपना सामान उतारने लगे....


"ले.. कब सीखेगा तू सीधे रास्ते चलना.. मेरे तो करम ही फुट गये तेरे साथ ब्याह करके.." सरदारनी सरदरजी को कोस्ती हुई उसके पिछे पिछे बस से उतर गयी...
..................................................................................................
सारी रात श्रुति बेड के एक कोने में सिमटी लेटी रही.. नितिन उसकी बराबर में ही चैन से सोया पड़ा था... पर श्रुति ने एक बार भी झपकी नही ली.. सोने से पहले नितिन ने वादा किया था कि कल उसको वो कॉलेज छ्चोड़ देगा.. नितिन के द्वारा सुनाई गयी कहानी उसके दिमाग़ में किसी पिक्चर की तरह चल रही थी.. लेते लेते उसने कयि बार रोहन के बारे में सोचा.. शकल से एक दम शरीफ और क्यूट से दिखने वाले रोहन से उसको पूरी हुम्दर्दि थी.. अगर उस'से प्यार करने और शादी करने तक की ही बात होती तो श्रुति इसको अपना सौभाग्य ही मान'ती.. नितिन के कहे अनुसार रोहन उसका दीवाना था भी.. पर नितिन उसको जिस रास्ते पर लेकर जाना चाहता था उसके बारे में तो श्रुति को सोचना भी पाप लगता था.. धोखा देना तो उसने कभी सीखा ही नही.. या यूँ कहें कि उसके खून में ही नही था.. बचपन में ही उसकी मा के गुजर जाने के बाद उसके बापू ने दूसरी शादी तक नही की.. ये सिर्फ़ उसकी मा के प्रति उसके बापू की वफ़ा नही तो और क्या थी.. वरना वंश चलाना कौन नही चाहता.. ना.. वो ऐसा नही कर सकती.. और करेगी भी नही..

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